गुरुवार, १० अप्रैल २००८

कुछ लघु कवितायें

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प्रेम निमंत्रण
यह प्रेम निमात्र्ण करता हूँ
ये सजनी तुम स्वीकार करो
पनघट को छोड़ राधा आवो
इस मुरारी से श्रृंगार करो
इस प्रेम पुंज की लौ को आवो
हम मिलकर कुछ तेज करें
यह प्रेम दिवस है आवो
हम मिलकर प्रेम अनंत हरें.
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रूप रंग
इन्द्रधनुष ने सातों रंग दीए
चंदन ने सुगंध दी देह को
और परियों सा रूप लिए
मेरी महबूबा जमीं पर आई
ऐसा रूप जिसे देख कर
ना जाने कितने कलमें पढ़ दीए जायें
फ़िर भी न जाने क्यों ऐसा लगता है
जैसे बात अभी अधूरी है ….

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मेरा चरित्र
यह चरित्र है मेरा कलंक में सना
न जाने कौन से मिटटी से मैं बना
हर बार सोचता हूँ अब पाक हो जाऊँ
पागल उस ने बनाया कैसे मैं सजाऊं
वो माफ़ करदे मुझको तक़दीर बदल लूँ
कालिख में पुती ये तस्वीर बदल लूँ

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शनिवार, ५ अप्रैल २००८

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मेरी माँ की ममता

मेरी माँ की ममता
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वही मेरी जिंदगी हैं, वही मेरा आशियाना हैं
उनके बिना कैसा जीना कैसा मर जाना है
दीपक की तरह जलती है वो, रौशन होता है मेरा जहाँ
वही है मेरी धरती, वही है मेरा आस्मान
उनके जलने से रौशन होता हूँ मैं
उनके सुगंध से महकता हूँ मैं
उनको पौधा ख़ुद को फूल कहता हूँ मैं

अब यही एक आस है कुछ कर दिखाना है
उनके लिए बहुत जी लिया अब मर दिखाना है

रचनाकार : अरुण भारती " घायल परिंदा "

बांसुरी चली आवो

बांसुरी चली आवो
स्नेह ही निमंत्रण है
शब्द शब्द दर्पण है
प्रेम की एक प्रेरणा है
एक यही विश्वास है


उस परी की प्रेरणा है
सुर सजाता जाता हूँ
छबि है उसकी अनोखी
हर तान छेड़ जाता हूँ

बांसुरी को होठ की तलाश है
मोरनी को बादलों की प्यास है

है अमर यह प्रेम
मैं इसका निमंत्रण करता हूँ
बस तुम्हारे प्रेम पर मैं
प्राण अर्पण करता हूँ

तुम न आई आज सजनी
सुर सजा ना पाउँगा
शब्द साथ छोड़ देंगे
गीत गा न पाउँगा
रचनाकार : अरूण भारती " घायल परींदा

गुरुवार, ३ अप्रैल २००८

शायराना महफ़िल


मैंने आंसू को समझाया
भरी महफील में न आया करो
आंसू बोला तुमको महफ़िल में तनहा पाते हैं
इसलिए तो चुपके से चले आते हैं ।

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