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प्रेम निमंत्रण
यह प्रेम निमात्र्ण करता हूँ
ये सजनी तुम स्वीकार करो
पनघट को छोड़ राधा आवो
इस मुरारी से श्रृंगार करो
इस प्रेम पुंज की लौ को आवो
हम मिलकर कुछ तेज करें
यह प्रेम दिवस है आवो
हम मिलकर प्रेम अनंत हरें.
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रूप रंग
इन्द्रधनुष ने सातों रंग दीए
चंदन ने सुगंध दी देह को
और परियों सा रूप लिए
मेरी महबूबा जमीं पर आई
ऐसा रूप जिसे देख कर
ना जाने कितने कलमें पढ़ दीए जायें
फ़िर भी न जाने क्यों ऐसा लगता है
जैसे बात अभी अधूरी है ….
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मेरा चरित्र
यह चरित्र है मेरा कलंक में सना
न जाने कौन से मिटटी से मैं बना
हर बार सोचता हूँ अब पाक हो जाऊँ
पागल उस ने बनाया कैसे मैं सजाऊं
वो माफ़ करदे मुझको तक़दीर बदल लूँ
कालिख में पुती ये तस्वीर बदल लूँ
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