बांसुरी चली आवो
स्नेह ही निमंत्रण है
शब्द शब्द दर्पण है
प्रेम की एक प्रेरणा है
एक यही विश्वास है
उस परी की प्रेरणा है
सुर सजाता जाता हूँ
छबि है उसकी अनोखी
हर तान छेड़ जाता हूँ
बांसुरी को होठ की तलाश है
मोरनी को बादलों की प्यास है
है अमर यह प्रेम
मैं इसका निमंत्रण करता हूँ
बस तुम्हारे प्रेम पर मैं
प्राण अर्पण करता हूँ
तुम न आई आज सजनी
सुर सजा ना पाउँगा
शब्द साथ छोड़ देंगे
गीत गा न पाउँगा
रचनाकार : अरूण भारती " घायल परींदा
शनिवार, 5 अप्रैल 2008
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